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History of Yoga in Hindi

योग का इतिहास
प्रचीनतम साहित्य वेदों में ही सबसे पहले योग की चर्चा की गयी है, सर्वप्रथम ऋग्वेद के प्रथम व नवम् मण्डल में योग की चर्चा हुई है, वेदों का मुख्य विषय ब्रहम ज्ञान या इसके अतिरिक्त ज्ञान काण्ड, कर्मकाण्ड आदि को बढ़ने में सहायक था, उस समय जो भी मनुष्य सांसारिक बन्धनों में बधें हुए थें उनमें चित्त के ज्ञान का विकास नहीं सकता था, उनके चित्त की शुद्धि के लिए दान, जप, यज्ञ जैसे आदि कर्मकाण्ड बताये गये थे, जब व्यक्ति की चित्त शुद्धि होकर उनमें ज्ञान ग्रहण करने की क्षसता उप्पन्न होने लगी, फिर उनको कर्मकाण्डों से हटाकर परमात्मा स्वरूप में लाने का प्रयास किया गया।
ऋग्वेद में भी इसकी चर्चा की गयी है, कुछ विद्वानों द्वारा कहा गया है कि योग सिन्धु घाटी सभ्यता से प्रारम्भ हुआ है, सिन्धु घाटी सभ्यता के अनेक जिवाष्म अवषेष एवं मुहरे भारत में योग की मौजूदगी के संकेत देती है। मोहनजोदडो़ में भी कुछ नर देवी देवताओं की योगमुद्रा में बैठी हुई मूर्तियां प्राप्त हुई है, जिससे यह सिद्ध होता है कि सिन्ध घाटी के लोग यौगिक विचार धारा के भलिभाति परिचित थे, सिन्धु घाटी सभ्यता कोई वैदिक सभ्यता नहीं थी, परन्तु यह वैदिक सभ्यता का ही एक अंग था।
यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन योग महान् वैदिक परम्परा का हिस्सा रहा है। पतंजलि ने तो बाद में इस शिक्षा का संकलन किया था। यौगिक शिक्षा के अन्तर्गत पतंजलि योग के समस्त पहलू शामिल हैं, जो पतंजलि से पहले वाले साहित्य में विद्यमान हैं, जैसे पुराण, महाभारत और उपनिषद् जिसमें पतंजलि का नाम बाद में आता है। योग का प्रणेता हिरण्यगर्भ को बताया जाता है, जो ब्रह्मांड में रचनात्मक और विकास मूलक शक्ति को निरुपित करते हैं। योग को और अधिक पीछे जाकर ऋग्वेद में भी ढूंढा जा सकता है, जो सबसे प्राचीन हिंदु ग्रन्थ है, जिसमें हमारे मन और अन्तर्दृृष्टि को सत्य अथवा वास्तविकता के प्रकाश के साथ सम्बद्ध करने की बात कही गई। प्राचीन काल में योग गुरुओं में अनेक प्रसिद्ध ऋषियों का नाम लिया जा सकता है जैसे वसिष्ठ,
याज्ञवल्क्य तथा जैगीशव्य। योगियों में जो योगेश्वर कहलाते हैं वह स्वयं श्रीकृष्ण है, जो भगवद्् गीता केनायक हैं। भगवद् गीता को योगशास्त्र भी कहा गया है, जिसके अंतर्गत योग पर प्रामाणिक कार्य उपलब्ध है। भगवान् शिव भी सर्वाधिक महान् योगी या आदिनाथ हैं।
भारत में योग मनुष्य के उस क्रियाकलाप का हिस्सा रहा है, जिसके द्वारा आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचा जा सकता है। योग का इतिहास 5 वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैः
1 वैदिक काल
2 पूर्व प्राचीन काल
3 प्राचीन काल
4 मध्यकाल
5 आधुनिक काल

वैदिक काल
वेद़-ऋचाएं विष्व में सबसे प्राचीन ग्रंथ है। संस्कृृत शब्द वेद का अर्थ है – ‘ज्ञान‘ और ऋक् का आषय ‘प्रषंसा‘ से है। इस प्रकार ऋग्वेद ऐसी ऋचाओं का संकलन है जिनमें सर्वशक्तिमान् की प्रषंसा की गई है। अन्य तीन वेद हैं – यजुर्वेद (यज्ञ का ज्ञान), सामवेद (गायन का ज्ञान), तथा अथर्ववेद (अथर्व का ज्ञान)। वैदिक काल में ब्रह्मांड में उच्चता को प्राप्त करने के साधन थे – ज्ञान या श्रुति, जिन्हें ध्यान के माध्यम से लिया जाता था। इसमें तीन योग शामिल हैं – मंत्र योग, प्राण योग और ध्यान योग।
मंत्र योग

जिसमें मंत्रों में निहित शक्ति के कारण, मंत्र मन के रूपांतरण के उपकरण के रूप में सक्रिय हो जाता है।

प्राण योग –
प्राणायाम के द्वारा जैव तंत्र को बल या शक्ति प्राप्त होती है।

ध्यान योग

  • ’धी‘ शब्द का आशय बुद्धि या मेधा से है, जो ध्यान शब्द का मूल है। ‘धी‘ यानी बुद्धि मन का आंतरिक भाग है, जिसके माध्यम से हमें शाश्वत सत्य को स्वीकार करने का सामर्थ्य मिलता है। ‘धी‘ अथवा बुद्धि का यह संवर्धन मुख्य रूप से विवेक संकाय है, जो योग और वेदान्त की प्रमुख विशेषता है।
    मन को एकाग्र करके एक स्थान/विचार पर स्थिर कर लेना ही ध्यान है। ‘ध्यान‘ वह अवस्था है जिसमें एकाग्र मन की वृत्तियां तेल की अनवरत प्रवाहमान धारा की तरह एकमात्र धारणा के इर्द-गिर्द प्रवाहित होने लगती हैं और इसके पश्चात् मानसिक योग्यताएं (मानस) में कोई भी बाहरी वस्तु मौजूद नहीं होती।
    ध्यान की पंाच विशेषताएं हैंः एकल विचार, सहजता, धीरता, सजगता, सहज विस्तार। मन की कोई भी अवस्था, जिसमें ये पांच विशेषताएं होती हैं उसे कहा जा सकता है कि वह ध्यान की अवस्था में है।
    मैत्रायणी उपनिषद् में योग को षडंग-योग कहा गया है, यानी 6 अंगों (षडंग) की समेकित प्रणाली।
    मैत्रायणी उपनिषद्् में इसे इस प्रकार वर्गीकृत किया गया हैः (1) श्वसन नियंत्रण (प्राणायाम), (2) इन्द्रिय नियंत्रण (प्रत्याहार), (3) ध्यान, (4) एकाग्रता (धारणा), (5) तर्क तथा (6) अन्तर्ज्ञान या अनुभवातीत/
    ज्ञानातीत अवस्था (समाधि), कठोपनिषद (2.5.4) के अनुसार योग एक ऐसी अवस्था है, जिसमें हमारी समस्त इन्द्रियां वश में हो जाती हैं, यानी इन्द्रियों पर और मन पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।
  • पूर्व-प्राचीन काल
    योग का सर्वाधिक असाधारण ग्रन्थ है भगवद्गीता, जिसकी रचना ईसा के लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुुई थी। भगवद्गीता के अनुसार ईश्वर से मिलने के चार मार्ग हैं। इन्हें इस प्रकार निरूपित किया गया हैः जैसे
    श्रेष्ठ कर्म (कर्म योग), श्रेष्ठ श्रद्धा/उपासना (भक्तियोग), श्रेष्ठ/परिशुद्ध ज्ञान (ज्ञान योग) तथा संकल्प
    शक्ति योग (राज योग)।
    भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय योग कहलाता है। प्रत्येक अध्याय में अंतिम सत्य तक पहुंचने का मार्ग योग का मार्ग ही है। भगवद््गीता में मानव अस्तित्व, आत्मा की अमरता और ईश्वर के साथ हमारे शाश्वत सम्बन्ध के बारे में विशेष ज्ञान मिलता है। यह ज्ञान किसी अपवाद के बिना हम सबके लिए है।
  • प्राचीन काल
    प्राचीन काल के दौरान यानी लगभग दूसरी शताब्दी में पतंजलि ने योग सूत्र लिखे थे, जिसमें 196 सूत्र हैं, जिनमें मानव जीवन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 8 सोपान (अष्टांग) निरूपित हैं, जो जन्म और मृृत्यु के दुःखों से मुक्ति का मार्ग है। इसे राजयोग यानी संकल्प शक्ति का योग कहा गया है।
    बुद्ध का अभ्युदय भी इसी काल में हुआ था, जिन्होंने हमें अष्ट मार्ग की शिक्षा दी, तथा जिसमें ध्यान पर विशेष जोर दिया गया है।
    विपाशना भारत की सबसे प्राचीन तकनीक है। लम्बे समय तक मानवता के लिए जिसका विलोप हो गया था उसे गौतम बुद्ध ने 2500 वर्षों से भी अधिक पूर्व पुनर्जीवित किया। विपाशना शब्द का अर्थ है, चीजों को उसी रूप में देखना जैसे वे वास्तव में होती हैं। यह आत्म-प्रेक्षण द्वारा स्वयं को परिशोधित करने की प्रक्रिया है। इसकी शुरूआत मन को एकाग्र करने हेतु सामान्य श्वसन क्रिया द्वारा होती है। इसमें गहन
    एकाग्रता के साथ व्यक्ति शरीर और मन की परिवर्तनशील प्रकृृति का अवलोकन करता है और आगे बढ़ता रहता है तथा अस्थाई और दु्ःखपूर्ण जीवन के शाश्वत सत्य की अनुभूति करने लगता है।
    जैन धर्म में प्रत्याहार और ध्यान योग के दो प्रमुख खंड हैं।
  • मध्यकाल में योग
    बुद्ध ने (लगभग 6ठी शताब्दी में) पूरे उपमहाद्वीप में ध्यान को लोकप्रिय बनाया था। किन्तु इसमें एक बात पर सहमति नहीं है कि कोई व्यक्ति ध्यान के माध्यम से आध्यात्मिक क्रियाएं तत्काल नहीं कर सकता।
    ध्यान के लिए पहले स्वयं को तत्पर करना होता है, 6ठी शताब्दी में जब बौद्ध धर्म के प्रभाव में कमी आ गयी थी तो मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ जैसे कुछ महान् योगियों ने इस पद्धति को परिशोधित किया। इस अवधि के दौरान हठ योग से सम्बन्धित कई ग्रंथों की रचना हुई।
    इस अवधि में जो प्रमुख ग्रन्थ लिखे गए, उनमें स्वात्माराम द्वारा रचित योग प्रदीपिका, श्रीनिवास योगी द्वारा रचित घेरंड संहिता एक संवादात्मक ग्रंथ, श्रीनिवास योगी द्वारा रचित हठरत्नावली, जिसमें योग के साथ-साथ आयुर्वेद पर भी विमर्श किया है, नित्यानाथ द्वारा रचित सिद्ध सिद्धान्त पद्धति आदि शामिल हैं।
    गुरु गोरखनाथ को नाथ सम्प्रदाय का प्रणेता माना जाता है और यह कहा जाता है कि नौ नाथ और 84 सिद्धों का मानव रूप में विश्व में योग और ध्यान का सन्देश प्रसारित करने के प्रयोजन से यौगिक अविर्भाव हुआ। वे यही योगी थे, जिन्होंने मानव को समाधि से अवगत कराया। कहा जाता है कि गुरू गोरखनाथ ने कई पुस्तकों की रचना की हैः जैसे – गोरख संहिता, गोरख गीता और योगचिन्तामणि।
  • आधुनिक काल में योग
    श्री अरविन्दो द्वारा रचित “समग्र योग” “Integral Yoga” अथवा पूर्ण योग में दिव्य शक्ति के प्रति संपूर्ण समर्पण पर जोर दिया है जो दिव्य शक्ति का मार्ग है, ताकि व्यक्ति का रूपांतरण हो सके।
    श्री रामकृष्ण परम हंस भक्ति योग और दिव्य प्रेम के मार्ग का समर्थन करते हैं। रामकृष्ण के विचार में सभी धर्म मानव मन की विविध इच्छाओं की संतुष्टि हेतु ईश्वर के विभिन्न रूपों का प्रकटीकरण है। श्री रामकृृष्ण का आधुनिक विष्व के लिए सबसे बड़ा योगदान हैः सभी धर्माें में सामंजस्य स्थापित करना।
    हठयोग परम्परानुसार-
    जब से मानव सभ्यता शुरू हुई तब से ही योग किया जा रहा है हठयोग परम्परा में योग की उत्पत्ति हजारों वर्ष पूर्व हुई थी, तथा धर्म आस्था की उत्पत्ति से पहले योग विद्या के रूप में योग के आदि गुरू के रूप में भगवान षिव को माना जाता हैै। इसीलिए भगवान षिव को योगीष्वर कहा जाता है-
    श्रीआदिनाथाय नमोस्तु तस्मै येनोपदिष्टा हठयोगविद्या।
    विभ्राजते प्रोन्नतराजयोगमारोढ़मिच्छोरधिरोहिणीव।।
    हठप्रदीपिका-1/1
    अर्थात उन सर्वषक्तिमान आदिनाथ को नमस्कार है जिन्होंने हठयोग विद्या की षिक्षा दी, जो राजयोग के उच्चतम षिखर पर चढ़ने की इच्छा रखने वाले अभ्यासियों के लिए सीढ़ी के समान है।
    भगवत्गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है कि-
    इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।। गीता-4/1
    अर्थात श्रीकृष्ण बोले मैंने इस अविनाषी योग को सूये से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मुन ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा।
    एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
    स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।। गीता-4/2
    अर्थात् हे परंतप अर्जुन इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग की राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया।
    स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
    भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।। गीता-4/3
    अर्थात् तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है, क्योंकि यह बडा़ ही उत्तम है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है।

याज्ञवल्क्य स्मृति-
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातन।
अर्थात् हिरण्यगर्भ ही योग के सबसे पुराने प्रवक्ता हैं,

योग की उत्पत्ति वैदिक साहित्य व वेदों में 900 से 500 ईषा पूर्व के बीच का वर्णन मिलता है, योग करने वाले साधकों को भी योगी कहा जाता था वेदों को संसार का सर्वप्रथम शास्त्र माना जाता है जिसकी उत्पत्ति लगभग 10000 वर्ष पूर्व बताया जाता है, पुरातत्वों का मानना है कि योग की उत्पत्ति 5000 ई0 पूर्व हुई थी। योग गुरू-षिष्य परम्परा थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों योग की षिक्षा निरन्तर चलती रही, योग दर्षन, षिव संहिता, भगवत्गीता, हठप्रदीपिका, वेद, उपनिषद्, स्मृति आदि विभिन्न ग्रन्थों मेें योग विद्या का उल्लेख मिलता है इन सभी को नदीं का रूप देकर महर्षि पतंजलि ने 200 ई0 पूर्व योग सूत्र की रचना की थी।

वर्तमान में योग को जन-जन तक पहुचाने का श्रेय बी0 एस0 अयंगर और स्मामी राम देव जी को जाता है, वर्तमान समय में योग का आवरण ही चुका है आज के दौर में दूर-दराज गांवों में भी षिक्षित और अषिक्षित सभी लोग आसन, प्राणायाम आदि योग अंगों का अभ्यास करते हुए नजर आते है। देष के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने पहली बार योग को दुनियाभर में फैलाने का कार्य किया 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यू0एन0जी0 ए0) के 69 वें सत्र को सम्बोधित करते हुए भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी ने विष्व समुदाय से अन्तराष्ट्रिय योग दिवस मनाने का आहवाहन किया और इसे भारी बहुमत के साथ स्वीकृति भी मिल गयी, और 21 जून 2015 को पहली बार अन्तराष्ट्रिय योग दिवस दिल्दी राजपथ में मनाया गया।

Hatha yoga text Siddhasiddhanta paddhati in Hindi notes for UGC NET JRF in Yoga

सिद्ध सिद्धांत पद्धति

महर्षि गोरक्षनाथ कृत

महायोगी श्री गोरक्षनाथ द्वारा रचित ग्रंथ सिद्ध सिद्धांत पद्धति योग विद्या का दुर्लभ ग्रंथ है। इस ग्रंथ में योग के विभिन्न आसनों से अलग देह में प्राण तत्व की व्यापकता और शरीर में पिंड की उत्पत्ति , पिण्ड का विचार, पिंड के विषय में सही ज्ञान इत्यादि विषयों पर व्यापक प्रकाश डालते हुए जिस प्रकार निरूपण महायोगी गोरखनाथ ने किया है वह बहुत ही अद्भुत एवं अभूतपूर्व है।

महायोगी श्री गोरक्षनाथ जी ने सिद्ध सिद्धांत पद्धति के अंतर्गत कुल छह उपदेशों में निम्नलिखित विषयो का विवेचन किया गया है।

प्रथम उपदेशपिण्डोत्पति
शरीरोत्पति निरूपण
परब्रह्म की आदिम पञ्च शक्तियां एवम् गुण
द्वितीय उपदेशपिण्ड विचार
तृतीय उपदेश पिण्डज्ञान
चतुर्थ उपदेश पिण्डधार
पञ्चम उपदेश पिण्डपदों में एकता
द्वादश वर्षों में क्रमशः योग सिद्धि
पंचविध गुरुकुल संतान (सिद्ध वंश परंपरा)
पञ्च संतान
सदगुरु के लक्षण
षष्ठ उपदेश
अवधूत योगी के लक्षण
अवधूत के लक्षण
अवधूत की सर्व स्वरूपता
परम पद की महिमा
सिद्ध सिद्धांत पद्धति का महात्म्य

उक्त उपदेशो उन्होंने जगत में नित्य निर्विकार परम सत्ता को ही जीवात्मा एवं योग साधना हेतु मुख्य मार्ग स्वीकार किया है । उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब साधक को अंड एवं पिण्ड का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब वह परम तत्व एवं परमात्मा की दिव्य सत्ता को जान जाता है और उसे प्राप्त करता है ।

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Yoga in Ishavashya upanishad in Hindi for NTA NET/JRF

योग उपनिषद्

  1. इशावास्योपनिषद
  2. कठोपनिषद
  3. प्रश्नोपनिषद
  4. मुण्डक उपनिषद्
  5. माण्डुक्य उपनिषद्
  6. केन उपनिषद्
  7. एतेरय उपनिषद्
  8. तेतिरियोपनिषद
  9. छान्द्ग्योपनिषद
  10. बृहदारन्यक उपनिषद्

ईशावास्योपनिषद्

स्लोक संख्या -1

ॐ ईशा पास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।

तेन त्यत्केन भुन्जीथा मा गृधरू कस्य स्विद्धनम्।। 2।।

अनुवाद-अखिल ब्रह्माण्ड में जों कुछ भी जड-चेतन स्वरूप जगत है, यह सभी  ईष्वर से व्याप्त है। उसे ईष्वर के साथ रखते हुए त्याग पूर्वक इसे भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि यह धन-भोग्य पदार्थ किसका है़? अर्थात् किसी का भी नही है।

प्रस्तूत श्लोक में योग की विभिन्न स्वरूप का वर्णन मिलता है,जो इस प्रकार है-

1 ज्ञान निष्ठा का वर्णन ;- इस संसार के किसी भी वस्तू विषय आदि की कामना में कभी अनुचित क्रर्म नही करना चाहिए । और नही असक्ति उत्पन्न होने देना चाहिए। यदि इस प्रकार की ज्ञान दृष्टि अपना लिया जाय तो मनुष्य सहज ही उस योग अवस्था में पहूॅच सकता हैं।

2 क्रर्म निष्ठा का भावना ;- क्योकि सम्पूर्ण जगत में एक मात्र ईश्वर को र्सव्यापक बताया है इस जगत में अपने क्रर्म को निष्काम भाव से करते हुए उस परमात्मा को प्राप्त करने  का प्रयास करना चाहिए।

3 भौतिक कामनायो से वैराग्य की भावना ;- सभी प्रकार के भोग साधन एवं चराचर जगत हमेशा नही रहने वाला होने से किसी का नही होनेे वाला बताया गया है इस लिए उसके प्रति र्व्यथ में असक्ति नही रखना चाहिए । उसका त्याग पूर्वक भोग करते हुए उस ईश्वर  को प्राप्त करने ेा प्रयास करना चाहिए।

स्लोक 2

क्ुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत  ॅ् समारू।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।2।।

अनुवाद -इस स्लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इव्छा करे। इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवा और मार्ग नहीं हैं, जिससे तुझे कर्म का लेप न हो।

स्लोक 6

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चाात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।6।।

अनुवाद -जो सम्पूर्ण भूतो को आतमा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी आत्मा को ही देखता है, वह इसके कारन ही किसी से घृृणा नहीं करता।ं

स्लोक 7

यस्मिन्सर्वाणि     भूतान्याात्मैेवाभूद्विजानतरू।

तत्र को मोहरू  करू शोक एकत्वमनुुपश्यतरू।।7।।

अनुवाद- जिस समय ज्ञानी प्ररूष केे लिए सब भूूत  आत्मा ही हो गयेे, उस समय एकत्व देनेे वाले को क्या शोेक और मोह हो सकता हैें।

ॐ शान्तिरू  शान्तिरू  शान्तिरू ।